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Saturday, December 21, 2013

54) साँस चलती रहती है

(Another poem in trash. Wrote it while I was in Vipassana)

साँस चलती रहती है, चाहे याद न रहता हो,
हर लम्हा है तू यादों में, बताता नहीं हूँ मैं |

जो गिर जाऊं मैं नज़रों से, मुझे कौन उठाएगा?
गिरी हुई चीज़ों को खुद, उठता नहीं हूँ मैं |

 कैसे मन की जानें यहाँ?भगवान नहीं कोई,
तो कैसे मैं भी जानूंगा ? विधाता नहीं हूँ मैं |

कब से प्यार बाँटा है, जाने कब तक बांटूंगा ?
मोहब्बत को खुद के लिए, बचाता नहीं हूँ मैं |

छीना क्यूँ दिल का सुकून, और पागल किया मुझे ?
नफरतों के फूल तो, उगता नहीं हूँ मैं |

मेरे मन को क्यूँ इतनी, चोट लगी 'अमन' ?
किसी के दिल को यूँ कभी, दुखाता नहीं हूँ मैं |

7 comments:

  1. Dip ke dard sabko batye nahi jate, agar bata bhi diye tho phir jataye nahi jate .................…

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  2. Hello sir....i read most of ur poems n all of them r based on same pattern why.....??? Cn u xplain it....n kya ap apne pattern se kuch alag hat ke bhi likh sakte ho......we'll wait......
    Ur student.....

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  3. namste sir...i am gopal sharma from agra your student (paramount). i want to know more about your spritual path (as i know you mantioned it above your poem) one reason is that i also on that path but i face too many difficulties. plz sir give some tips related spritual stages like vippassna turia. thnku so much sir

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