
वो इश्क निकल गया, संगदिल की चाह निकल गयी|
देख उन के जलवे, सब हैरान हैं जब वो
लहरा हवा में आँचल, यूँ सरे राह निकल गयी|
जो तुझे बता ना पाया, वो शर्म-ओ-हया की बात,
सो कलम से हो कागज़ पर, बेपनाह निकल गयी|
टकरा के मेरे दिल से, गूँजी है तेरी हर बात,
सो नज़र जिगर के पार कुछ इस तराह निकल गयी|
कभी आशिक की तुरबत से हो कर, तुम गुजर गए,
कभी गलियों से खुद मेरी, दरगाह निकल गयी|
रोक रखी थी जान के इंतज़ार में ही जान,
आये तो जान के साथ 'सुभानल्लाह' निकल गयी|
ज़ानों पर बैठा था, हाथ में मोहब्बत-ऐ-गुल लिए,
वो नज़र हिला के मौज में, बेपरवाह निकल गयी|
क्यों उन ही से मोहब्बत होनी थी, मुझ गरीब को?
दिल के आर-पार, नज़र-ऐ-ज़ादी-ऐ-शाह निकल गयी|
क्यों मेरी तरह भंवरों ने भी रखा है दिल पर हाथ,
शायद गुलशन से भी उस की इक निगाह निकल गयी|
'अमन' को भी है कदर-ओ-हवस, मेरी शायरी की,
जो बेइख्तियार ज़ुबान से भी, वाह निकल गयी|
Meanings: संगदिल-stone heart, हैरान-astonished, शर्म-ओ-हया-blushing and shyness
इस तराह-in such a way (इस तरह), तुरबत-coffin, ज़ान-knees
ज़ादी-ए-शाह-princess (शहज़ादी), नज़र-ए-ज़ादी-ए-शाह-a look of princess
क़दर-ओ-हवस-respect and wish, बेइख्तियार-uncontrolled, वाह-wow
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